सितम्बर 28 – एक-दूसरे से प्रेम करे।
“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर दया रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो.” (रोमियों 12:10)
इसराइल देश में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई शादीशुदा था और उसकी पत्नी व बच्चे थे, जबकि छोटा भाई कुंवारा था. वे दोनों गेहूँ की फसल काटते थे और अपना अनाज अपने-अपने भंडार में रखते थे. एक रात, दोनों में से किसी को नींद नहीं आई.
बड़े भाई ने मन ही मन सोचा, “मेरा बेचारा भाई! वह कुंवारा है. मेरे दो बच्चे हैं, और हम सब मिलकर काम करते हैं. मेरे छोटे भाई की ज़रूरतें अच्छी तरह पूरी होनी चाहिए.” इसलिए, रात के समय उसने अपने भंडार से अनाज का एक गट्ठर लिया, उसे अपने भाई के भंडार तक ले गया और चुपचाप वहाँ रख दिया.
उसी रात, छोटा भाई भी उठा और उसने सोचा, “मेरा बेचारा बड़ा भाई! उसे दो बच्चों की देखभाल करनी पड़ती है. इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण करना उसके लिए कितना मुश्किल होगा.” इसलिए उसने अपने भंडार से अनाज का एक बड़ा गट्ठर लिया और उसे अपने भाई के भंडार में रख दिया.
कई रातों तक ऐसा ही चलता रहा. हर भाई, दूसरे के प्रति प्रेम और चिंता के कारण, चुपचाप अनाज और अन्य ज़रूरी चीज़ें अपने भाई के भंडार तक पहुँचाता रहा.
एक रात, जब वे दोनों एक-दूसरे के लिए अनाज ले जा रहे थे, तो अचानक उनकी मुलाकात हो गई. छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को गले लगाया और कहा, “भैया, मैं यह आपके लिए ला रहा था.” बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को गले लगाया और जवाब दिया, “मेरे प्यारे भाई, मैं यह तुम्हारे लिए ला रहा था. मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.” दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया और रो पड़े.
कहा जाता है कि प्रभु ने उन्हें देखा और कहा, “अपने बच्चों के बीच ऐसे भाईचारे के प्रेम की नींव पर, मैं अपना निवास स्थान बनाना चाहता हूँ.”
परमेश्वर के प्रिय लोगों, अपने अंदर मसीह का स्वभाव बनने दो. जैसे मसीह दयालु, करुणामयी और क्षमाशील हैं, वैसे ही आप भी दूसरों को पूरे दिल से क्षमा करे. “और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो.” (कुलुस्सियों 3:13) और सबसे बढ़कर, प्रेम को धारण करे: “और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो.” (कुलुस्सियों 3:14)
परमेश्वर प्रेम है. चूँकि आप यीशु मसीह की संतान हैं, जो स्वयं प्रेम है, इसलिए आपको उसके दिव्य प्रेम को धारण करना चाहिए.
यह कहने का क्या लाभ है कि “मुझे अभिषेक मिला है; मैंने बपतिस्मा लिया है; मैं स्वर्ग जा रहा हूँ,” यदि आपके हृदय में प्रेम नहीं है?
प्रेरित पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 13 में इसे बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है. “यदि मैं मनुष्यों, और सवर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झांझ हूं. और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूं, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं. और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण संपत्ति कंगालों को खिला दूं, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूं, और प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं.” (1 कुरिन्थियों 13:1-3)
क्योंकि परमेश्वर ने हमसे इतना महान प्रेम किया है, इसलिए हम एक-दूसरे से प्रेम करने के ऋणी हैं. मसीह का प्रेम वह बंधन बने जो हमें जोड़े रखे, वह अनुग्रह जो हमें क्षमा करने में समर्थ बनाए, और जहाँ भी हम जाएँ, वहाँ उसकी उपस्थिति की सुगंध फैलाए.
मनन के लिए वचन: “हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया, तो हम को भी आपस में प्रेम रखना चाहिए.” (1 यूहन्ना 4:11)