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अक्टूबर 18 – शास्त्रियों और फरीसियों से बढ़कर धार्मिकता।

“क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे॥” (मत्ती 5:20)

पहाड़ी उपदेश में, प्रभु ने कई बार धार्मिकता के बारे में बात की है. परमेश्वर के लोगों की धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर होनी चाहिए.

फरीसी एक खास तरह की धार्मिकता का पालन करते थे. वे सप्ताह में दो बार उपवास रखते थे. वे अपनी सारी संपत्ति का दसवां भाग (दशमांश) देते थे. जब एक फरीसी ने प्रार्थना में अपने धार्मिक कामों का ज़िक्र किया, तो उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि वह दूसरे पापियों जैसा नहीं है, और बताया कि वह सप्ताह में दो बार उपवास रखता है और अपनी सारी संपत्ति का दसवां भाग देता है (लूका 18:11–12).

इसलिए प्रभु हमें सिखाते हैं कि हमारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों से बढ़कर होनी चाहिए. अगर वे सप्ताह में दो बार उपवास रखते थे, तो क्या हमें उपवास रखने में हिचकिचाहट होनी चाहिए? अगर वे ईमानदारी से अपना दसवां भाग देते थे, तो क्या हमें इसे देने में लापरवाही करनी चाहिए?

हमारे देश में कई सच्चे और नेक लोग हैं जो ईमानदारी और मिसाल बनने लायक जीवन जीना चाहते हैं. ऐसे साधु, तपस्वी, पवित्र लोग और दूसरे लोग भी हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर तक पहुँचना चाहते हैं और खुद को आध्यात्मिक साधनाओं में लगाते हैं. क्या एक मसीही का जीवन उनसे भी ज़्यादा मिसाल बनने लायक नहीं होना चाहिए? इसलिए, सचमुच धार्मिक जीवन जीने के लिए खुद को प्रभु को सौंप दें.

एक बार एक मसीही ने गर्व से कहा, “मैं कभी रिश्वत नहीं लेता.” एक ब्राह्मण महिला ने उसे यह कहते हुए सुना और जवाब दिया, “मैं भी रिश्वत नहीं लेती. नए साल पर, हमारे ऑफिस के साथ काम करने वाला एक ठेकेदार आया और सभी को नई डायरियाँ बाँटीं. मैंने उसे भी रिश्वत का ही एक रूप माना, इसलिए मैंने उसे लेने से मना कर दिया. लेकिन मैंने आपको उसे लेते हुए देखा. तो फिर, आपकी धार्मिकता कहाँ है?” मसीही उस सवाल का जवाब नहीं दे सका.

परमेश्वर के प्रिय लोगों, हमारी धार्मिकता सिर्फ़ मुँह से कही जाने वाली बात नहीं होनी चाहिए. यह हमारे रोज़मर्रा के जीवन की ईमानदारी में दिखनी चाहिए. परमेश्वर के एक सेवक ने एक बार बताया: “मैं सुबह देर तक सोता था. लेकिन लगभग पाँच बजे, मुझे मस्जिद से प्रार्थना के लिए बुलावा सुनाई देता था. इसने मेरे दिल को गहराई से छू लिया. अब मैं उनकी प्रार्थना शुरू होने से पहले ही उठकर प्रार्थना करता हूँ. मैं यह पक्का करना चाहता हूँ कि मेरी धार्मिकता उनसे ज़्यादा हो.”

मुसलमान दिन में पाँच बार प्रार्थना करते हैं. दाऊद, जो चाहता था कि परमेश्वर के प्रति उसकी भक्ति दूसरों से ज़्यादा हो, उसने कहा कि वह झूठ से नफ़रत करता है, परमेश्वर के वचन से प्यार करता है, और परमेश्वर के

सही फैसलों के कारण दिन में सात बार उसकी स्तुति करता है (भजन संहिता 119:163–164). यह हमारे लिए कितनी बड़ी चुनौती है!

मनन के लिए वचन: “ईश्वर न करे कि मैं तुम लोगों को सच्चा ठहराऊं, जब तक मेरा प्राण न छूटे तब तक मैं अपनी खराई से न हटूंगा.” (अय्यूब 27:5)

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