Appam, Appam - Hindi

सितम्बर 25 – एक ऐसा मन जो सुनता है।

“और अपनी सन्तान सहित अपने सारे मन और सारे प्राण से अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिर कर उसके पास लौट आए, और इन सब आज्ञाओं के अनुसार जो मैं आज तुझे सुनाता हूं उसकी बातें माने; तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा.” (व्यवस्थाविवरण 30:2–3)

अपने मन को ऐसा हृदय बनने दें जो प्रभु की आवाज़ सुनता है. सिर्फ़ उनकी आवाज़ सुनने से कहीं ज़्यादा, इसे ऐसा मन बनने दें जो उनकी बात सुनता है और उनका कहना मानता है. व्यवस्थाविवरण 28:1–14 में उन आशीषों का विस्तार से वर्णन है जो तब मिलती हैं जब हम ध्यानपूर्वक प्रभु की आवाज़ सुनते और उसको मानते हैं, जबकि अध्याय का बाकी हिस्सा उन परिणामों के बारे में बताता है जो तब आते हैं जब उसकी आवाज़ को हम नहीं सुनते और न मानते.

हम मुख्य रूप से प्रभु की आवाज़ उनके वचन के माध्यम से सुनते हैं. सारा शास्त्र पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखा गया है, और उसका वचन आत्मा और जीवन है. यह सीधे हमारी आत्मा और मन से बात करता है.

वचन हमें थकान के समय मज़बूती देता है. यह निराशा और अविश्वास की जगह विश्वास भर देता है. जब भी हम उलझन में होते हैं और नहीं जानते कि किस रास्ते पर जाएँ, तो यह हमारे पैरों के लिए एक दीपक और हमारे मार्ग के लिए रोशनी बन जाता है.

“यहोवा की वाणी शक्तिशाली है, यहोवा की वाणी प्रतापमय है.” (भजन संहिता 29:4)

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो परमेश्वर से बहस करते हैं और बेकार के सवाल उठाते हैं: “बाइबल साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती कि हमें शराब नहीं पीनी चाहिए?” “क्या शास्त्र कहता है कि हमें टेलीविज़न कार्यक्रम नहीं देखने चाहिए?” “कहाँ लिखा है कि हमें धूम्रपान नहीं करना चाहिए?” उनकी बहसें कभी खत्म नहीं होतीं.

असली समस्या यह है कि उनमें पूरे मन से परमेश्वर का वचन सुनने की कोई इच्छा नहीं होती. यह पूछने के बजाय कि “प्रभु मुझसे क्या चाहते हैं?”, वे बस कम-से-कम ज़रूरी काम ढूँढ़ते हैं जिससे उनका काम चल जाए.

यहाँ तक कि दुनिया के लोग भी अक्सर नशे, अनैतिकता और जुए को गलत मानते हैं. बहुत से लोग तो दुनियावी मनोरंजन भी नहीं चाहते. क्या धार्मिकता और पवित्र परमेश्वर के लोगो को दुनिया के मानकों से बेहतर नहीं होना चाहिए?

जब आप प्रभु के सामने स्तुति का बलिदान चढ़ाते हैं और उनके सामने इंतज़ार करते हैं, तो प्रभु आपसे बात करते है. वह अपने वचन के ज़रिए बात करते हैं, और अपनी इच्छा के अनुसार सपनों या दर्शनों के ज़रिए आपको मार्गदर्शन देते हैं. इसलिए, उनकी आवाज़ पर ध्यान दें और आज्ञाकारी बनकर जवाब दें.

जब हम प्रभु की बात सुनते हैं, तो उनकी आशीष हमें घेरे रहती है. लेकिन जब हम उनकी बात सुनने से इनकार करते हैं और अपना दिल कठोर कर लेते हैं, तो हम खुद को ऐसे रास्ते पर ले जाते हैं जो दुख और नुकसान की ओर ले जाता है.

परमेश्वर के प्रिय लोगों, खुद को आज्ञा न मानने के रास्ते से दूर रखें और आज्ञा मानने के आशीष में चलें. सुनने वाला दिल रखे. प्रार्थना के साथ वचन पढ़ें, उस पर ध्यान से सोचें, और प्रभु जो कुछ भी दिखाएँ, उसे मानने के लिए तैयार रहें.

आगे मनन के लिए वचन: “यहोवा तेरे लिये अपने आकाशरूपी उत्तम भण्डार को खोल कर तेरी भूमि पर समय पर मेंह बरसाया करेगा, और तेरे सारे कामों पर आशीष देगा; और तू बहुतेरी जातियों को उधार देगा, परन्तु किसी से तुझे उधार लेना न पड़ेगा.” (व्यवस्थाविवरण 28:12)

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