जुलाई 30 – यह कैसा मंदिर है?
“यहोवा यों कहता है, आकाश मेरा सिंहासन और पृथ्वी मेरे चरणों की चौकी है; तुम मेरे लिये कैसा भवन बनाओगे, और मेरे विश्राम का कौन सा स्थान होगा?” (यशायाह 66:1)
पुराने समय से ही लोग परमेश्वर की आराधना करने के लिए जगहें ढूंढते रहे हैं. अमीर लोग शानदार इमारतें और ऊँचे पवित्र स्थान बनाते हैं. गरीब लोग साधारण आराधना-स्थल बनाते हैं. कुछ लोग पेड़ों के नीचे आराधना-स्थल बनाते हैं, तो कुछ पहाड़ों की चोटियों पर.
फिर भी प्रभु कहते हैं: “स्वर्ग मेरा सिंहासन है और पृथ्वी मेरे पैरों की चौकी है.” जो ऊँचे और महान सिंहासन पर विराजमान हैं, वह पूछते हैं, “तुम मेरे लिए कैसा घर बना सकते हो?” विशाल ब्रह्मांड भी उन्हें समा नहीं सकता. स्वयं स्वर्ग भी उनकी महिमा को पूरी तरह समा नहीं सकता. तो फिर मनुष्य सर्वशक्तिमान परमेश्वर के योग्य रहने का स्थान कैसे बना सकता है?
परमेश्वर ही वह हैं जिन्होंने अपने वचन से सूर्य, चंद्रमा और तारों की रचना की. फिर भी बहुत से लोग, उनकी महानता को समझे बिना, एक छोटा सा पत्थर चुनते हैं, उसे आराधन-स्थल बनाते हैं, अपनी कल्पना में परमेश्वर को वहाँ स्थापित करते हैं और फिर उसके पीछे दरवाज़ा बंद कर देते हैं.
इंसान यह भूल गया है कि परमेश्वर ने स्वयं अपने निवास के लिए एक मंदिर बनाया है—ऐसा मंदिर जो पत्थर या ईंट से नहीं बना है. वह मंदिर हमारा अपना शरीर है. हम स्वयं ही उनका निवास-स्थान हैं.
धर्मग्रंथ कहता है: “क्या तुम नहीं जानते, कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो, और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नाश करेगा तो परमेश्वर उसे नाश करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह तुम हो.” (1 कुरिन्थियों 3:16–17)
परमेश्वर मनुष्यों के भीतर वास करना चाहते हैं. फिर भी मनुष्य अक्सर परमेश्वर को दूर रखना पसंद करते हैं—उन्हें किसी इमारत, किसी रीति-रिवाज या किसी खास जगह तक सीमित रखना चाहते हैं.
ऐसा क्यों है? क्योंकि अगर परमेश्वर सचमुच हमारे भीतर वास करते हैं, तो हम अपनी इच्छाओं के अनुसार नहीं जी सकते. हम उनके होने का दावा करते हुए पापपूर्ण आदतों और सांसारिक सुखों में खुलकर लिप्त नहीं हो सकते. यदि प्रभु हमारे भीतर रहते हैं, तो हमारे जीवन में उनकी पवित्रता झलकनी चाहिए.
यह कितनी अद्भुत सच्चाई है कि प्रभु हममें वास करना चुनते हैं! हमारे शरीर कमजोर हैं. वे बीमार पड़ सकते हैं. दुर्घटना में उन्हें चोट लग सकती है. एक दिन उन्हें मृत्यु का सामना करना पड़ेगा. फिर भी, परमेश्वर ने हमें अपना निवास-स्थान बनने के लिए चुना है.
अनंत परमेश्वर ने नश्वर मनुष्यों में वास करने का निर्णय लिया है ताकि उन्हें अनंत जीवन दे सके. उन्होंने हमारे पार्थिव शरीरों को महिमामय शरीरों में बदलने का निर्णय लिया है. यह कितना अद्भुत सौभाग्य है!
परमेश्वर के प्रिय लोगों, कभी मत भूले कि आप परमेश्वर के मंदिर है.
मनन के लिए वचन: “महासागर के शब्द से, और समुद्र की महातरंगों से, विराजमान यहोवा अधिक महान है॥ तेरी चितौनियां अति विश्वासयोग्य हैं; हे यहोवा तेरे भवन को युग युग पवित्रता ही शोभा देती है॥” (भजन संहिता 93:4–5)