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सितम्बर 23 – प्यार करने वाला हृदय।

“तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना. (व्यवस्थाविवरण 6:5)

हालाँकि प्रभु ने इस्राएल के लोगों को दस आज्ञाएँ दी थीं, लेकिन उन्होंने प्रभु से प्रेम करने को सबसे पहली और सबसे बड़ी आज्ञा माना. हमें प्रभु से प्रेम करना है, और अपने पड़ोसी से भी प्रेम करना है. असल में, मसीही जीवन प्रेम का मार्ग है. यह केवल एक ऐसा विश्वास नहीं है जिसमें हम परमेश्वर के प्रेम का अनुभव करते हैं; यह एक ऐसा जीवन है जिसमें हम लगातार परमेश्वर और दूसरों के प्रति उस प्रेम को व्यक्त करते हैं.

केवल प्रभु का प्रेम पाकर ही न रुकें. बदले में उनसे भरपूर प्रेम करें और उनका सम्मान करें. खुशी से उनकी स्तुति करें और उनमें आनंद लें. जैसे गहरा सागर गहरे सागर को पुकारता है, वैसे ही प्रभु का हृदय आपके प्रेम और संगति के लिए तरसता है.

“जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है.” (1 यूहन्ना 4:8). कुछ लोग गलतफहमी में कह सकते हैं, “प्रेम ही परमेश्वर है.” लेकिन प्रेम खुद परमेश्वर नहीं हो सकता. प्रेम परमेश्वर के सबसे महान गुणों में से एक है. कलवरी का प्रेम आपके लिए बलिदान के प्रेम के रूप में आया. उस प्रेम के कारण, प्रभु ने खुशी-खुशी क्रूस का दुख सहा ताकि वे आपको पापों की क्षमा, छुटकारा और आशीष दे सकें.

आप उससे प्रेम करने में कैसे असफल हो सकते हैं जिसने आपके लिए खुद को दे दिया और आपकी खातिर अपने लहू की आखिरी बूंद भी बहा दी?

जिस मसीह में परमेश्वर का प्रेम नहीं है, वह मसीह के चरित्र को सही ढंग से नहीं दिखा सकता. इसीलिए प्रेरित पौलुस ने प्रेम के विषय पर एक पूरा अध्याय समर्पित किया—1 कुरिन्थियों 13.

“यदि मैं मनुष्यों, और सवर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झांझ हूं.” (1 कुरिन्थियों 13:1)

प्रभु कुछ लोगों को आत्मिक वरदान और महान आत्मिक शक्ति दे सकते हैं, और उनके द्वारा बड़े-बड़े काम कर सकते हैं. फिर भी, जब वे घमंडी और खुद को बड़ा समझने वाले बन जाते हैं, तो वे अपने पहले प्रेम में बने रहने में असफल हो सकते हैं और अंततः दूर हो सकते हैं.

प्रभु हमसे हमारे पहले प्रेम और पूरे दिल से किए गए प्रेम की इच्छा रखते हैं. इसीलिए उन्होंने पतरस से पूछा: “भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उस से कहा, हां प्रभु तू तो जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरे मेमनों को चरा. उस ने फिर दूसरी बार उस से कहा, हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उन से कहा, हां, प्रभु तू जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरी भेड़ों की रखवाली कर. उस ने तीसरी बार उस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? पतरस उदास हुआ, कि उस ने उसे तीसरी बार ऐसा कहा; कि क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? और उस से कहा, हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है: तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: यीशु ने उस से कहा, मेरी भेड़ों को चरा.” (यूहन्ना 21:15-17)

तो फिर, हम कैसे दावा कर सकते हैं कि हम मसीह से प्यार करते हैं, जबकि हम अपने दिल की गहराई से उनसे सच्चा प्यार नहीं करते? स्वार्थी प्यार को छोड़ दें. दिखावटी और पाखंडी प्यार को त्याग दें. बिना किसी धोखे या पाखंड के, सच्चे और शुद्ध दिल से प्रभु से प्यार करने का संकल्प लें.

पवित्र शास्त्र कहता है: “और यीशु मसीह की ओर से, जो विश्वासयोग्य साक्षी और मरे हुओं में से जी उठने वालों में पहिलौठा, और पृथ्वी के राजाओं का हाकिम है, तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे: जो हम से प्रेम रखता है, और जिस ने अपने लोहू के द्वारा हमें पापों से छुड़ाया है. और हमें एक राज्य और अपने पिता परमेश्वर के लिये याजक भी बना दिया; उसी की महिमा और पराक्रम युगानुयुग रहे. आमीन.” (प्रकाशितवाक्य 1:5–6)

परमेश्वर के प्रिय लोगों, मसीह के प्यार को अपने हृदय में बसने दे. उनसे सिर्फ़ शब्दों से नहीं, बल्कि अपने पूरे जीवन से प्यार करे. आपका प्यार आपकी आज्ञाकारिता, आपकी उपासना, आपके रिश्तों, आपका त्याग और आपकी सेवा में दिखनी चाहिए.

मनन के लिए वचन: “हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उस ने हम से प्रेम किया.” (1 यूहन्ना 4:19)

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